Friday, April 3, 2026

Uttamasloka Kathamritam

उत्तमश्लोक कथामृतम

उत्तमश्लोक कथामृतम


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Shri Radha Kund Prabhu Ji
वरिष्ठ प्रचारक एवं मार्गदर्शक

श्रीमान राधा कुण्ड प्रभु जी

अध्यक्ष - इस्कॉन जेवर | उपाध्यक्ष - इस्कॉन नोएडा
  • प्रभु जी पिछले 25 वर्षों से कड़े ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए हरिनाम तथा भागवत धर्म का प्रचार के रूप में समाज की सेवा कर रहे हैं।
  • परम पूज्य लोकनाथ स्वामी महाराज के अत्यंत प्रिय शिष्य, जो महाराज की व्यक्तिगत देख-रेख में शिक्षित हुए हैं।
  • थाईलैंड, म्यांमार और नेपाल में स्थित महाराज के शिष्यों के लिए 'काउंसलर' (Counsellor) के रूप में सेवा प्रदान करते हैं।
  • कोह-सामुई, थाईलैंड में एक भव्य मंदिर निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
  • प्रभु जी के सरल और गहरा आध्यात्मिक अनुभव जिज्ञासुओं को शास्त्र समझने में अत्यंत सहायक होता है।

वर्तमान अध्ययन (Current Reading)

श्री प्रेमभक्ति चन्द्रिका - श्रील नरोत्तम दास ठाकुर रचित

यह ग्रंथ भक्ति मार्ग के साधकों के लिए एक दिव्य मार्गदर्शिका है, जो हृदय के अनर्थों को दूर करने की कला सिखाता है।

आज का दिव्य विचार
"अन्य अभिलाष छाडि, ज्ञान कर्म परिहरि,
काय मने कोरिबो भजन।
साधु सङ्ग कृष्ण सेवा, ना पूजिबो अन्य देवा
एइ भक्ति परम कारण॥"
अर्थ: अन्य सभी भौतिक अभिलाषाओं को त्यागकर, मैं तन-मन से श्रीकृष्ण का भजन करूँगा। साधुओं के संग में रहकर केवल कृष्ण की सेवा करूँगा; क्योंकि यह अनन्य भक्ति ही कृष्ण प्रेम को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है।
— श्रील नरोत्तम दास ठाकुर (प्रेमभक्ति चन्द्रिका)

हमारी स्वाध्याय यात्रा

भक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि एक विज्ञान है। हमने अब तक यह प्रामाणिक ग्रंथों का अध्ययन पूर्ण किया है:

श्रीमद् भागवतम् (प्रथम स्कन्ध)
श्रीमद् भागवतम् (प्रथम स्कन्ध)
श्रीमद् भागवतम् (द्वितीय स्कन्ध)
श्रीमद् भागवतम् (द्वितीय स्कन्ध)
हरिनाम चिन्तामणि
हरिनाम चिन्तामणि
मनः शिक्षा
मनः शिक्षा
शरणागति
शरणागति
मुकुन्दमाला स्तोत्र
मुकुन्दमाला स्तोत्र
प्रार्थना
प्रार्थना
श्री ब्रह्मसंहिता
श्री ब्रह्मसंहिता
व्रजमण्डल दर्शन
व्रजमण्डल दर्शन
श्री कृष्ण स्वरूप चिन्तन
श्री कृष्ण स्वरूप चिन्तन
वर्तमान पाठ
श्री प्रेम भक्ति चन्द्रिका
श्री प्रेम भक्ति चन्द्रिका

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"जीवन क्षणभंगुर है, पर भगवान का नाम और उनकी कथा शाश्वत है।"

© 2026 नित्यं भागवत-सेवया | श्रील प्रभुपाद की जय

गजेंद्र मोक्ष स्तुति - श्रीमद्भागवतम् (स्कंध 8, अध्याय 3, श्लोक 2-29) - Gajendra Moksha Stuti

गजेंद्र मोक्ष स्तुति

गजेंद्र मोक्ष स्तुति

श्रीमद्भागवतम् (8.3.2 - 8.3.29)

श्लोक मूल संस्कृत (Sanskrit Verse) सार (Essence) भगवान के संबोधन (Names)
8.3.2 ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥
समस्त जड़ तथा चेतना के स्रोत भगवते, पुरुषाया, आदिबीजाय, परेशाय
8.3.3 यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥
उन्हीं का विस्तार, वही आधार स्वयम्भुवम्, परस्मात्-परम्
8.3.4 यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्वच तत्तिरोहितम् ।
अविद्धद‍ृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोऽवतु मां परात्पर: ॥
उन्ही से सृष्टि उन्ही में विलय साक्षी, अज, आत्ममूलो, परात्पर:
8.3.5 कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदासीद्गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥
समय के साथ सब विनाश, पर भगवान अपनी महिमा में स्थित रहते है विभुः
8.3.6 न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु
र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥
सामान्य बुद्धि से नहीं समझा जा सकता दुरत्ययानुक्रमणः
8.3.7 दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं
विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥
उनके मंगलमय चरण सबकी काम्य भूतात्मभूताः , सुहृदःिः
8.3.8 न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा
न नामरूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥
भौतिक जन्म-कर्म, नाम, रूप, लीलाओं से परे
8.3.9 तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥
असंख्य रूप, निराकार भी परेशाय, ब्रह्मणे, अनन्तशक्तये, अरूपाय, उरुरूपाय, आश्चर्यकर्मणे
8.3.10 नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥
कृष्ण कृपा से ही कृष्ण का दर्शन सम्भव आत्मप्रदीपाय, साक्षिणे, परमात्मने, गिरां मनसश्चेतसामप विदूराय
8.3.11 सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥
विशुद्ध सत्त्व में स्थित भक्त दर्शन कर पाते है कैवल्यनाथाय, निर्वाणसुखसंविदे
8.3.12 नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥
असंख्य अवतार शान्ताय,घोराय, मूढाय, गुणधर्मिणे, निर्विशेषाय, साम्याय, ज्ञानघनाय
8.3.13 क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥
सबको जानते हैं क्षेत्रज्ञाय, सर्वाध्यक्षाय, साक्षिणे, पुरुषाय, आत्ममूलाय, मूलप्रकृतये
8.3.14 सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छायोक्ताय सदभासाय ते नमः ॥
यह जगत आध्यात्मिक जगत का प्रतिविम्ब मात्र सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे, सर्वप्रत्ययहेतवे
8.3.15 नमो नमस्तेऽखिलकारणाय
निष्कारणायद्भुतकारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥
वह सबका कारन, उनका कोई कारन नहीं अखिलकारणाय, निष्कारणाय, अद्भुतकारणाय, सर्वागमान्माय, महार्णवाय, अपवर्गाय,
8.3.16 गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥
वैदिक रीती-निति से परे स्वयंप्रकाशाय
8.3.17 मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहतै नमस्ते ॥
भगवान मुक्त, परम करुणामय, निरलस प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय, मुक्ताय, भूरिकरुणाय, भगवते बृहतै
8.3.18 आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभि: स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ ॥
बद्धजीव के लिए दुष्प्राप्य, मुक्तात्मा के लिए सहजलाभ्य ज्ञानात्मने, भगवते, ईश्वराय
8.3.19 यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥
सर्वोच्च आशीर्वाद के प्रदाता अदभ्रदयो
8.3.20 एकातिनो यस्य न कञ्चनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥
अनन्य भक्तों के आनंद का स्रोत अत्यद्भुतं, सुमङ्गलं
8.3.21 तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम
अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम
अनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥
भौतिक इन्द्रियों से बोधगम्य नहीं अक्षरं, अतीन्द्रियं, परिपूर्णम्
8.3.22 यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥
सभी कृष्ण के क्षुद्रतिक्षुद्र अंश
8.3.23 यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिषः ।
तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥
निरंतर एवं असंख्य सृष्टि तथा विलय
8.3.24 स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्
न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन् न चासन्
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥
परम दिव्य भगवान - भौतिक जगत के कुछ भी उनका वर्णन नहीं कर सकते निषेधशेषो (The Ultimate Balance)
8.3.25 जीजीविषे नाहमिहामुया किम
अन्तर्बहिश्चावृतयेभदेहेन ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणप्रमोक्षम् ॥
शुद्ध भक्त कुछ भी नहीं चाहते
8.3.26 सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥
सबका दिव्य आश्रय विश्ववेदसम्, विश्वात्मानम्, अजम, ब्रह्म, परं पदम्
8.3.27 योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्मि अहम् ॥
कृष्ण प्राप्ति का एकमात्र सूत्र - तीव्र इच्छा योगेशं
8.3.28 नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदमिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥
कृष्ण कृपा से ही माया से मुक्ति संभव प्रपन्नपालाय, दुरन्तशक्तये
8.3.29 नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥
मेरी त्रुटियों को क्षमा करें, मुझे शरण दें भगवन्तम्

Saturday, March 7, 2026

Padyāvalī by Rūpa Gosvāmī - Nāma Sankīrtanam (नाम सङ्कीर्तनम्)

श्रीपद्यावली

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित
Śrī Padyāvalī complied by Śrīla Rūpa Gosvāmī

नाम सङ्कीर्तनम्
Nāma Sankīrtanam


श्रीपद्यावली श्लोक ३२ (छन्द : अनुष्टुभ् )
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥

अनुवाद
घास के तिनके से भी अधिक विनम्र, वृक्ष से भी अधिक सहनशील बनकर, सम्मान की अपेक्षा न करके दूसरों को सम्मान देते हुए, सदैव श्रीहरि के नाम का कीर्तन करना चाहिए।
- भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु

Padyāvalī Verse 32 (meter : Anuṣṭubh)
tṛṇādapi sunīcena tarorapi sahiṣṇunā.
amāninā mānadena kīrtanīyaḥ sadā hariḥ.

Translation
One who thinks himself lower than the grass, who is more tolerant than a tree, and who does not expect personal honor yet is always prepared to give all respect to others can very easily always chant the holy name of the Lord.
- Bhagavāna Śrīcaitanya Mahāprabhu


श्रीपद्यावली श्लोक ३३ (छन्द : शार्दूलविक्रीड़ितम्)
श्रीरामेति जनार्दनेति जगतां नाथेति नारायणे-
त्यानन्देति दयापरेती कमलाकान्तेति कृष्णेति च। 
श्रीमन्नाम-महामृताब्धिलहरीकल्लोलमग्नं मुहु-
र्मुह्यतं गलदश्रु-नेत्रमवशं मां नाथ नित्यम कुरु 

अनुवाद
श्री राम, जनार्दन (भक्तों के रक्षाकर्ता), जगतों के नाथ, नारायण, आनंद (परमानंद का प्रतिमूर्ति ), दयापर (दयालु), कमलाकांत (लक्ष्मीदेवी के पति), कृष्ण। हे प्रभु, कृपया मुझे इन परम सुंदर नामों के महान अमृत सिंधु की लहरों में बार-बार डुबकी लगाते हुए मेरी नेत्रों को बहते आँसुओं से भर दें।
- श्रीलक्ष्मीधर 

Padyāvalī Verse 33 (meter : Śārdūlavikrīr̤itam)
śrīrāmeti janārdaneti jagatāṃ nātheti nārāyaṇe-
tyānandeti dayāparetī kamalākānteti kṛṣṇeti ca. 
śrīmannāma-mahāmṛtābdhilaharīkallolamagnaṃ muhu-
rmuhyataṃ galadaśru-netramavaśaṃ māṃ nātha nityama kuru.

Translation
Sri Rāma, Janārdana (rescuer of the devotees), Jagatām Nātha (master of the universes), Nārāyana, Ananda (transcendental bliss personified), Dayāpara (merciful one), Kamalākānta (husband of Lakshmi), Krishna. O Lord, please make me become overwhelmed with tears streaming from my eyes as I repeatedly plunge into the waves of the great nectar ocean of these beautiful transcendental names.
- Śrīlakṣmīdhara

श्रीपद्यावली श्लोक ३६ (छन्द : शार्दूलविक्रीड़ितम्)
हे गोपालक हे कृपाजलनिधे हे सिन्धु कन्यापते
हे कंसान्तक हे गजेन्द्र करुणा पारीण हे माधव |
हे रामानुज हे जगत् त्रय गुरो हे पुण्डरीकाक्ष माम्
हे गोपीजननाथ पालय परम् जानामि न त्वाम् विना ॥

अनुवाद
हे गोपाल! हे दया के सागर! हे सिन्धु कन्या लक्ष्मी के पति! हे कंस के अंतकारी! हे गजेंद्र के करुणा-कर्ता! हे माधव! हे रामानुज! हे तीनों लोकों के गुरु! हे कमल-नेत्र वाले गोपियों के स्वामी! मैं आपसे श्रेष्ठ किसी को नहीं जानता। कृपया मेरी रक्षा करें।
- श्रीवैष्णव  

Padyāvalī Verse 36 (meter : Śārdūlavikrīr̤itam)
he gopālaka he kṛpā-jala-nidhe he sindhu-kanyā-pate
he kaṃsāntaka he gajendra-karuṇā-pārīṇa he mādhava .
he rāmānuja he jagat-traya-guro he puṇḍarīkākṣa māṃ
he gopī-jana-nātha pālaya paraṃ jānāmi na tvāṃ vinā

Translation
O young cowherd boy! O ocean of mercy! O husband of Lakṣmī, the ocean's daughter! O killer of Kaṁsa! O merciful benefactor of Gajendra! O Mādhava! O younger brother of Rāma! O spiritual master of the three worlds! O lotus-eyed Lord of the gopīs! I know no one greater than You. Please protect me.
- Śrī Vaiṣṇava

Friday, February 13, 2026

Padyāvalī by Rūpa Gosvāmī - Nāma Māhātmyam (नाम माहात्म्यम्)

श्रीपद्यावली

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित
Śrī Padyāvalī complied by Śrīla Rūpa Gosvāmī

नाम माहात्म्यम्
Nāma Māhātmyam

श्रीपद्यावली श्लोक १९ (छन्द : स्रग्धरा )
कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां
पाथेयं यनमुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रोच्चामानम्।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानां
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये कृष्णनाम ॥

अनुवाद
कृष्ण का पवित्र नाम, जो सभी पारलौकिक खुशियों का भंडार है, कलियुग के पापों का नाश करने वाला, सभी पवित्र द्रव्यों में सबसे पवित्र, आध्यात्मिक जगत के रास्ते पर चलते हुए साधुओं का भोजन, महान संतों, दार्शनिकों तथा कवियों की पवित्र वाणी का एकमात्र विश्रामस्थल हैं, सज्जनों का जीवन, और धर्म रूपी वृक्ष का बीज, आप सभी को सुमङ्गल प्रदान करें।
- किसी अनजान कवी

Padyāvalī Verse 19 (meter : sragdharā)
kalyāṇānāṃ nidhānaṃ kalimalamathanaṃ pāvanaṃ pāvanānāṃ
pātheyaṃ yanamumukṣoḥ sapadi parapadaprāptaye proccāmānam
viśrāmasthānamekaṃ kavivaravacasāṃ jīvanaṃ sajjanānāṃ
bījaṃ dharmadrumasya prabhavatu bhavatāṃ bhūtaye kṛṣṇanāma
Translation
May Kṛṣṇa's holy name, which is a reservoir of all transcendental happiness, the destructor of Kaliyuga sins, the most purifying of all purifying things, the saintly person's food as he traverse the path to the spiritual world, pleasure garden where the voices of the greatest saints, philosophers and poets play, the life of the righteous, and the seed of the tree of religion, bring transcendental auspiciousness to you all.
- Athur unknown

श्रीपद्यावली श्लोक २२ (छन्द : शार्दूलविक्रीड़ितम् )
चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्
आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्री-कृष्ण-सण्कीर्तनम्॥

अनुवाद
भगवान कृष्ण के पवित्र नाम के संकीर्तन की परम विजय हो, जो ह्रदय रूपी दर्पण को स्वच्छ बना सकता है और भवसागर रूपी प्रज्ज्वलित अग्नि के दुखों का शमन कर सकता है। यह संकीर्तन उस वर्धमान चन्द्रमा के समान है, हो समस्त जीवों के लिए सौभाग्य रूपी श्वेतकमल का वितरण करता है। यह समस्त विद्या का जीवन है। कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन दिव्य जीवन के आनंदमय सागर विस्तार करता है। यह सबों को शीतलता प्रदान करता है और मनुष्यों को प्रति पग पर पूर्ण अमृत का आस्वादन करने में समर्थ बनाता है।
- भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु

Padyāvalī Verse 22 (meter : Śārdūlavikrīr̤itam)
ceto-darpaṇa-mārjanaḿ bhava-mahā-dāvāgni-nirvāpaṇaḿ
śreyaḥ-kairava-candrikā-vitaraṇaḿ vidyā-vadhū-jīvanam
ānandāmbudhi-vardhanaḿ prati-padaḿ pūrṇāmṛtāsvādanaḿ
sarvātma-snapanaḿ paraḿ vijayate śrī-kṛṣṇa-sańkīrtanam
Translation
Let there be all victory for the chanting of the holy name of Lord Kṛṣṇa, which can cleanse the mirror of the heart and stop the miseries of the blazing fire of material existence. That chanting is the waxing moon that spreads the white lotus of good fortune for all living entities. It is the life and soul of all education. The chanting of the holy name of Kṛṣṇa expands the blissful ocean of transcendental life. It gives a cooling effect to everyone and enables one to taste full nectar at every step.
- Bhagavāna Śrīcaitanya Mahāprabhu

श्रीपद्यावली श्लोक २५ (छन्द : अनुष्टुभ् )
नाम चिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रस-विग्रहः।
पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वान्नामनामिनोः॥

अनुवाद
कृष्ण का पवित्र नाम दिव्य रूप से आनंदमय है। यह सभी प्रकार के आध्यात्मिक वर देने वाला है, क्योंकि यह समस्त आनन्द के आगार, स्वयं कृष्ण है। कृष्णा का नाम पूर्ण है और यह सभी दिव्य रसों का स्वरुप है। यह किसी भी स्थिति में भौतिक नाम नहीं है और यह स्वयं कृष्ण से किसी भी प्रकार से कम शक्तिशाली नहीं है। चूँकि कृष्ण का नाम भौतिक गुणों से कलुषित नहीं होता, अतएव इसका माया से लिप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। कृष्ण का नाम सदैव मुक्त तथा आध्यात्मिक है, यह कभी भी भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा बढ़ नहीं होता। ऐसा इसलिए है क्योंकि कृष्ण-नाम तथा स्वयं कृष्ण अभिन्न हैं।
- पद्म पुराण

Padyāvalī Verse 25 (meter : Anuṣṭubh)
nāma cintāmaṇiḥ kṛṣṇaścaitanya-rasa-vigrahaḥ
pūrṇaḥ śuddho nityamukto'bhinnatvānnāmanāminoḥ
Translation
The holy name of Kṛṣṇa is transcendentally blissful. It bestows all spiritual benedictions, for it is Kṛṣṇa Himself, the reservoir of all pleasure. Kṛṣṇa’s name is complete, and it is the form of all transcendental mellows. It is not a material name under any condition, and it is no less powerful than Kṛṣṇa Himself. Since Kṛṣṇa’s name is not contaminated by the material qualities, there is no question of its being involved with māyā. Kṛṣṇa’s name is always liberated and spiritual; it is never conditioned by the laws of material nature. This is because the name of Kṛṣṇa and Kṛṣṇa Himself are identical.
- Padma Purāṇa

श्रीपद्यावली श्लोक २५ (छन्द : मालिनी )
मधुरमधुरमेतन्मङ्गलं मङ्गलानां
सकलनिगमवल्लीसत्फलं चित्स्वरूपम् ।
सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा
भृगुवर नरमात्रं तारयेत्कृष्णनाम ॥

अनुवाद
हे भृगु श्रेष्ठ, मधुर से भी मधुर, मङ्गलों का भी मङ्गलकारक, सम्पूर्ण वैदिक साहित्य रूपी लता का सुन्दर फल. एवं चैतन्यस्वरूप श्रीकृष्णनाम का श्रद्धा के साथ अथवा अवमानना से, एकबार भी उच्चारण कर लिया तो जीव मात्र को अनायास संसारसागर से तार लेता हैं।
- स्कन्द पुराण

Padyāvalī Verse 25 (meter : Mālinī)
madhura-madhuram etan maṅgalaṁ maṅgalānāṁ
sakala-nigama-vallī-sat-phalaṁ cit-svarūpam
sakṛd api parigītaṁ śraddhayā helayā vā
bhṛgu-vara nara-mātraṁ tārayet kṛṣṇa-nāma
Translation
Kṛṣṇa's name is sweetest of all sweets, the most auspicious of all auspicious things, the transcendental vine of all Vedic literature. O best of the Bhrigus, chanted even once, either with faith or contempt, delivers the chanter.
- Skanda Purāṇa

श्रीपद्यावली श्लोक ३० (छन्द : अनुष्टुभ् )
विचेयानि विचार्याणि विचिन्त्यानि पुनः पुनः ।
कृपणस्य धनानीव त्वन्नामानि भवन्तु नः ॥

अनुवाद
हे दयामय! जिस प्रकार एक कृपण अपने धन का निरंतर सञ्चय, चिंतन और संरक्षण करता है, उसी प्रकार मैं आपके पवित्र नामों का बार-बार चयन, चिंतन और ध्यान करूँ।
- श्री भवानन्द

Padyāvalī Verse 30 (meter : Anuṣṭubh)
viceyāni vicāryāṇi vicintyāni punaḥ punaḥ
kṛpaṇasya dhanānīva tvan-nāmāni bhavantu naḥ
Translation
May Your holy names be selected, reflected upon, and meditated upon again and again, just as a miser constantly contemplates and protects his wealth.
- Śrī Bhavānanda

श्रीपद्यावली श्लोक ३१ (छन्द : वसन्ततिलकम् )
नाम्नाम् अकारि बहुधा निज-सर्व-शक्तिस्
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः
एतादृशी तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इहाजनि नानुरागः॥

अनुवाद
हे प्रभु, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान, आपके पवित्र नाम में जीव के लिए सर्व सौभाग्य निहित है, अतः आपके अनेक नाम है यथा कृष्ण तथा गोविन्द, जिनके द्वारा आप अपना विस्तार करते हैं। आपने अपने इन नामों में अपनी सारि शक्तियाँ भर दी हैं और उनका स्मरण करने के लिए कोई निश्चित नियम भी नहीं है। हे प्रभु, यद्यपि आप अपने पवित्र नामों की उदारतापूर्वक शिक्षा देकर पतित बद्ध जीवों पर ऐसी कृपा करते हैं, किन्तु मैं इतना अभागा हूँ की मैं पवित्र नाम का जप करते समय अपराध करता हूँ, अतः मुझमे जप करने के लिए अनुराग उत्पन्न नहीं हो पता हैं।
- भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु

Padyāvalī Verse 31 (meter : Vasantatilakam )
nāmnām akāri bahudhā nija-sarva-śaktis
tatrārpitā niyamitaḥ smaraṇe na kālaḥ
etādṛśī tava kṛpā bhagavan mamāpi
durdaivam īdṛśam ihājani nānurāgaḥ
Translation
My Lord, O Supreme Personality of Godhead, in Your holy name there is all good fortune for the living entity, and therefore You have many names, such as “Kṛṣṇa” and “Govinda,” by which You expand Yourself. You have invested all Your potencies in those names, and there are no hard and fast rules for remembering them. My dear Lord, although You bestow such mercy upon the fallen, conditioned souls by liberally teaching Your holy names, I am so unfortunate that I commit offenses while chanting the holy name, and therefore I do not achieve attachment for chanting.
- Bhagavāna Śrīcaitanya Mahāprabhu

सर्वोच्च आशीर्वाद के प्रदाता | Gajendra Moksha Stuti 19 Part 2 | SB 8.3.19 | 07 Feb 2026

Thursday, February 5, 2026

Padyāvalī by Rūpa Gosvāmī - Bhajana Māhātmya

श्रीपद्यावली

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित
Śrī Padyāvalī complied by Śrīla Rūpa Gosvāmī

भजन माहात्म्य
Bhajana Māhātmya

श्रीपद्यवाली श्लोक ८ (छन्द : शार्दूलविक्रीड़ितम)
व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का
का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्यकिं पौरुषम् ।
कुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं
भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः ॥

अनुवाद
भक्तिप्रिय श्रीमाधव केवल विशुद्ध भक्ति से ही शरणागत जन पर प्रसन्न हो जाते है, भक्ति रहित गुणों से नहीं। यदि केवल गुणों से ही प्रसन्न होते तो व्याध का कौनसा अच्छा आचरण था। ध्रुव महाराज तो मात्र पांच वर्ष के थे। गजेन्द्रके पास कौन-सी विद्या थी ? विदुरकी कौन-सी ऊँची जाति थी ? यदुपति उग्रसेनका कौन-सा पराक्रम था? कुब्जाका कौनसा सुन्दर रूप था ? सुदामाके पास कौन-सा धन था ?

śrīpadyavālī Verse 8 (meter : śārdūlavikrīr̤itama)
vyādhasyācaraṇaṃ dhruvasya ca vayo vidyā gajendrasya kā
kā jātirvidurasya yādavapaterugrasyakiṃ pauruṣam .
kubjāyāḥ kimu nāma rūpamadhikaṃ kiṃ tatsudāmno dhanaṃ
bhaktyā tuṣyati kevalaṃ na ca guṇairbhaktipriyo mādhavaḥ
Translation
What was the good conduct of the hunter Dharma? Did Dhruva have age? Did Gajendra have knowledge? Did Kubjā have special beauty? Did Sudāmā have wealth? Did Vidura have a noble lineage? Did the King of the Yadus, Ugrasena, have valor? He whose pleasure is bhakti, Mādhava, Is satisfied only by bhakti, And not by qualities [such as those aforementioned].

श्रीपद्यवाली श्लोक १२  (छन्द : मालिनी)
अलमलमियमेव प्राणिनां पातकानां
निरसनविषये या कृष्ण कृष्णेति वाणी।
यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा
विलुठती चरणाब्जे मोक्षसम्राज्यलक्ष्मीः॥
रचनाकार - श्रीसर्वज्ञ 

अनुवाद 
हे कृष्ण! हे कृष्ण! यह वाणी सभी प्राणी के समस्त पापों को नाश करने हेतु ही पर्याप्त है। और यदि मुक्तिप्रदाता श्री मुकुंद के चरणकमलों में सान्द्रानंदा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाये तो स्वयं मोक्ष भी इन भक्त के चरणों में लोटपोट हो जाते है। 

śrīpadyavālī Verse 12 (meter :  malini)
alamalamiyameva prāṇināṃ pātakānāṃ
nirasanaviṣaye yā kṛṣṇa kṛṣṇeti vāṇī
yadi bhavati mukunde bhaktirānandasāndrā
viluṭhatī caraṇābje mokṣasamrājyalakṣmīḥ
Author : śrīsarvajña
Translation
The words kṛṣṇa! kṛṣṇa! are sufficient to purify all the sins of all living entities. If they have blissful service to the Lord, then the goddess of liberation bows before their lotus feet.


श्लोक १४ (छन्द : रथोद्धता )
कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः क्रियतां यदि कुतोपि लभ्यते।
तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं जन्मकोटि-सुकृतैार्न लभ्यते॥

अनुवाद
कृष्ण भावनामृत में शुद्ध भक्ति करोडो जन्मों के पुण्य कार्य के द्वारा भी प्राप्त नहीं हो सकती। इसे प्राप्त करने का केवल एक ही मूल्य है - तीब्र लालसा। यदि यह कहीं मिल जाए, तो तुरंत इसे खरीद लेना चाहिए।
- श्री रामानन्द राय

Verse 14 (meter : rathoddhatā)
kṛṣṇabhaktirasabhāvitā matiḥ kriyatāṃ yadi kutoapi labhyate
tatra laulyamapi mūlyamekalaṃ janmakoṭi-sukṛtaiārna labhyate.
Translation
Pure devotional service in Kṛṣṇa consciousness can not be had even by pious activity in hundreds and thousands of lives. It can be obtained only by paying one price - that is, intense greed to obtain it. If it is available somewhere, one must purchase it without any delay.
- śrī Rāmānanda Rāya

Padyāvalī by Rūpa Gosvāmī - Śrīkṛṣṇasya Mahimā

श्रीपद्यावली

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित
Śrī Padyāvalī complied by Śrīla Rūpa Gosvāmī

श्रीकृष्णस्य महिमा
Śrīkṛṣṇasya Mahimā

श्लोक ६ (छन्द : शार्दूलविक्रीड़ितम )
अम्बोधिः स्थलतां स्थलं जलधितां धुलीलवः शैलातां 
शीलो मृतकणतां तृणां कुलिश्तां वज्रं तृणाक्षीणतां। 
वह्निः शीतलतां हिमं दहनतायामिति यस्येच्छया 
लीला-दुर्ललिताद्भुत-व्यसनीने कृष्णाय तस्मै नमः।  

अनुवाद
जिनकी इच्छा शक्ति से समुद्र स्थल और स्थल समुद्र बन जाता है, धूलिकण पर्वत और पर्वत धूलिकण, तृण वज्र और वज्र तृण से भी बलहीन, अग्नि शीतल एवं परम शीतल हिम भी अग्नि भाव को प्राप्त हो जाता है, अतएव जिनकी लीला शक्ति अज्ञेय है, इस प्रकार अद्भुत अचिन्त्य  गुणों से परिपूर्ण कृष्ण को हमारा नमन। 

Verse 6 (meter : śārdūlavikrīr̤itama)
ambodhiḥ sathalatāṃ sthalaṃ jaladhitāṃ dhulīlavaḥ śailātāṃ 
śīlo mṛtakaṇatāṃ tṛṇāṃ kuliśtāṃ vajraṃ tṛṇākṣīṇatāṃ. 
vahniḥ śītalatāṃ himaṃ dahanatāyāmiti yasyecchayā 
līlā-durlalitādbhuta-vyasanīne kṛṣṇāya tasmai namaḥ.

Translation

श्लोक ७ 

Verse 7 (meter : śārdūlavikrīr̤itama)

Translation

धर्म से अर्थ, मुक्ति का पथ | Gajendra Moksha Stuti 18 19 | SB 8.3.18-19 ...

Wednesday, February 4, 2026

Padyavali by Rupa Gosvami - Grantharambhe Mangalacharana

श्रीपद्यावली

श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित
Śri Padyāvalī complied by Śrīla Rūpa Gosvāmī

ग्रन्थारम्भे मङ्गलाचरण 
Granthārambhe Maṅgalācaraṇa

श्रीपद्यवाली श्लोक १ (छन्द : वसन्ततिलकम)
पद्यावली विरचित रसिकैर्मुकुन्द-
सम्बन्ध-बन्धुर-पदा प्रमोदर्मिसिंधुः।   
रम्या समस्ततमसां दामनी क्रमेण 
संगृह्यते कृतिकदम्बक-कौतुकाय। 

अनुवाद
श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में परम मनोहर पदों से युक्त, अतएव आनन्दतरङ्गों की समुद्रस्वरूपा एवं समस्त अज्ञानता विनाशकारिणी परम रमणिया यह पद्यावली , भक्तिरस के रसिक भक्तगणों के द्वारा निर्मित हुई है। समस्त भक्तों के परम आनंद के लिए यह सङ्कलन किया गया है। 

śrīpadyavālī Verse 1 (meter : vasantatilakam)
padyāvalī viracita rasikairmukunda-
sambandha-bandhura-padā pramodarmisiṃdhuḥ.   
ramyā samastatamasāṃ dāmanī krameṇa 
saṃgṛhyate kṛtikadambaka-kautukāya.

Translation
This Padyavali (Anthology of Poetry) was written by devotees expert in the mellows of devotional service. This book contains many beautiful verses, which have been collected for the pleasure of the devotees. It illuminates the darkness of ignorance, and it is an ocean of transcendental bliss.

श्रीपद्यवाली श्लोक २ (छन्द : अनुष्टुभ्)
नमो नलिननेत्राय वेणुवाद्यविनोदिने।  
राधाधर-सुधापान-शालीने वनमालिने। 

अनुवाद 
जिनके दोनों नेत्र विकसित कमल के सदृश है और जो भक्तों के आनंद के हेतु वेणुवाद्य क्रीड़ा में तत्पर है, एवं जो श्रीराधिका के अधरामृत पान करते हैं, वनमाला से  सुशोभित ऐसे श्री कृष्ण के लिए हमारा बारम्बार नमस्कार है। 

śrīpadyavālī Verse 2 (meter : anushtubh)
namo nalinanetrāya veṇuvādyavinodine.
rādhādhara-sudhāpāna-śālīne vanamāline.

Translation
To śrī kṛṣṇa, whose eyes are beautiful like lotus flowers, who delights in playing the flute, who drinks the nectar of Radharani's lips, and who is garlanded with forest flowers, I offer my respectful obeisances.    


श्रीपद्यवाली श्लोक ३ (छन्द : शार्दूलविक्रीड़ितम)
भक्तिप्रह्व-विलोकन-प्रणयनी नीलोत्पल-स्पर्धिनी 
ध्यानालम्बनतां समधिनिरतैर्नीते हिताप्राप्तये। 
लावण्येकमहानिधी रसिकतां राधादृशोस्तनवती 
युष्माकं कुरुतां भवार्तिशमनं नेत्रे तनूर्वा हरेः। 

अनुवाद 
भगवान श्रीकृष्ण के नेत्रयुगल अथवा श्रीविग्रह, जिनको भक्तगण प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते रहते हैं, जो नीलकमल के सुन्दरता को म्लान कर देते है, शुभता प्राप्ति के लिए जिन पर योगीगण ध्यान करते हैं, जो सुंदरता का एक महान सागर है, और जो राधारानी की आँखों को प्रेमामृत से भर देता है, वह आपके समस्त भौतिक कष्टों का शमन करे।


śrīpadyavālī Verse 3 (meter: (śārdūlavikrīr̤itama)
bhaktiprahva-vilokana-praṇayanī nīlotpala-spardhinī 
dhyānālambanatāṃ samadhiniratairnīte hitāprāptaye. 
lāvaṇyekamahānidhī rasikatāṃ rādhādṛśostanavatī 
yuṣmākaṃ kurutāṃ bhavārtiśamanaṃ netre tanūrvā hareḥ.

May Lord Hari's eyes or form, on which the devotees lovingly gage, which rivals the splendor of blue lotuses, on which the yogis meditate to achieve auspiciousness, which is a great ocean of handsomeness, and which fills Radharani's eyes with the nectar of love, quell for you the sufferings of material life. 


Wednesday, January 21, 2026

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Monday, January 19, 2026

Padyavali by Śrī Rūpa Gosvāmī

श्रीपद्यावली

श्रीला रूप गोस्वामी द्वारा संकलित

पद्यावली — श्री रूप गोस्वामी

पद्यावली गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्रमुख आचार्य श्री रूप गोस्वामी द्वारा संकलित संस्कृत भक्तिकाव्यों का एक उत्कृष्ट संग्रह है। यह ग्रंथ किसी एक कथा का क्रमिक वर्णन न होकर, भक्ति-रस के क्रमिक अनुभवन हेतु विषयानुसार सुव्यवस्थित काव्य-संग्रह है।

ग्रंथ का आरंभ मङ्गलाचरण, नाम-माहात्म्य एवं भजन की महिमा से होता है। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण के रूप, गुण और लीला की माधुर्यपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत की जाती है, जो क्रमशः श्रीराधा-तत्त्व की सर्वोच्चता, विप्रलम्भ (विरह) तथा संयोग (मिलन) के गूढ़ भावों तक पहुँचती है। अंत में भक्त-प्रार्थना के माध्यम से शरणागत भक्ति का भाव प्रकट होता है।

इस प्रकार पद्यावली, भक्ति-रसामृत-सिन्धु की अनुभूतिमूलक सहचरी के रूप में, साधक एवं रसिक पाठकों को व्रज-भक्ति के अंतःलोक में प्रवेश कराने वाला एक अनुपम ग्रंथ है।

Padyāvalī — Śrī Rūpa Gosvāmī

Padyāvalī is a celebrated anthology of Sanskrit devotional poetry compiled by Śrī Rūpa Gosvāmī, the principal theologian of the Gauḍīya Vaiṣṇava tradition. Rather than a continuous narrative,  Padyāvalī  is thematically arranged to guide the reader through the progressive experience of bhakti-rasa.

Beginning with maṅgalācaraṇa, nāma-mahimā, and the glory of bhajanaPadyāvalī  gradually unfolds the mādhurya of Śrī Kṛṣṇa’s rūpa, guṇa, and līlā, culminating in profound sections on Śrī Rādhā’s supremacy, vipralambha (loving separation), and saṁyoga (union). The collection concludes with heartfelt bhakta-prārthanā, embodying the mood of surrendered devotion.

Through its careful progression of themes and refined poetic selection, Padyāvalī functions as a rasa-sādhana companion to Bhakti-rasāmṛta-sindhu, offering practitioners and rasika readers a contemplative pathway into the inner world of Vraja-bhakti


विषय सूचि Contents

पद्यावली – Śrī Rūpa Gosvāmī
Viṣaya-wise Verse Distribution

क्रम विषय (Devanāgarī) Viṣaya (IAST) श्लोक संख्या
1 ग्रन्थारम्भे मङ्गलाचरण Padyāvalī : Granthārambhe Maṅgalācaraṇa5
2 श्रीकृष्णस्य महिमा Padyāvalī : Śrī-Kṛṣṇasya Mahimā 2
3 भजन-माहात्म्य Padyāvalī : Bhajana-Māhātmya 8
4 प्रेम्णः सौभाग्यम् Padyāvalī : Premṇaḥ Saubhāgyam 3
5 नाम-माहात्म्य Padyāvalī : Nāma-Māhātmya 16
6 नाम-सङ्कीर्तनम् Padyāvalī : Nāma-Saṅkīrtanam 7
7 श्रीकृष्ण-रूप-माधुर्यम् Padyāvalī : Śrī-Kṛṣṇa-Rūpa-Mādhuryam 20
8 श्रीकृष्ण-गुण-माधुर्यम् Padyāvalī : Śrī-Kṛṣṇa-Guṇa-Mādhuryam 43
9 श्रीकृष्ण-लीला-माधुर्यम् Padyāvalī : Śrī-Kṛṣṇa-Līlā-Mādhuryam 90
10 व्रजदेवी-विशेषतः श्रीराधा-माहात्म्य Padyāvalī : Vraja-Devī, Viśeṣataḥ Śrī-Rādhā-Māhātmya 71
11 विप्रलम्भ-श्रृङ्गारः Padyāvalī : Vipralambha-Śṛṅgāra 84
12 संयोग-श्रृङ्गारः Padyāvalī : Saṁyoga-Śṛṅgāra 64
13 भक्त-वियोगः Padyāvalī : Bhakta-Viyoga 17
14 भक्त-प्रार्थना Padyāvalī : Bhakta-Prārthanā 20
15 उपसंहारः Padyāvalī : Upasaṁhāra 6
Padyāvalī में कुल श्लोक संख्या (Total Verses) 456

Uttamasloka Kathamritam

उत्तमश्लोक कथामृतम उत्तमश्लोक कथामृतम श्रील प्रभुपाद और महान आचार्यों के मार्गदर्शन...