Friday, April 3, 2026

Uttamasloka Kathamritam

उत्तमश्लोक कथामृतम

उत्तमश्लोक कथामृतम


श्रील प्रभुपाद और महान आचार्यों के मार्गदर्शन में प्रतिदिन एक घंटा भक्ति-योग के रहस्यों को समर्पित करें।

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Shri Radha Kund Prabhu Ji
वरिष्ठ प्रचारक एवं मार्गदर्शक

श्रीमान राधा कुण्ड प्रभु जी

अध्यक्ष - इस्कॉन जेवर | उपाध्यक्ष - इस्कॉन नोएडा
  • प्रभु जी पिछले 25 वर्षों से कड़े ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए हरिनाम तथा भागवत धर्म का प्रचार के रूप में समाज की सेवा कर रहे हैं।
  • परम पूज्य लोकनाथ स्वामी महाराज के अत्यंत प्रिय शिष्य, जो महाराज की व्यक्तिगत देख-रेख में शिक्षित हुए हैं।
  • थाईलैंड, म्यांमार और नेपाल में स्थित महाराज के शिष्यों के लिए 'काउंसलर' (Counsellor) के रूप में सेवा प्रदान करते हैं।
  • कोह-सामुई, थाईलैंड में एक भव्य मंदिर निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
  • प्रभु जी के सरल और गहरा आध्यात्मिक अनुभव जिज्ञासुओं को शास्त्र समझने में अत्यंत सहायक होता है।

वर्तमान अध्ययन (Current Reading)

श्री प्रेमभक्ति चन्द्रिका - श्रील नरोत्तम दास ठाकुर रचित

यह ग्रंथ भक्ति मार्ग के साधकों के लिए एक दिव्य मार्गदर्शिका है, जो हृदय के अनर्थों को दूर करने की कला सिखाता है।

आज का दिव्य विचार
"अन्य अभिलाष छाडि, ज्ञान कर्म परिहरि,
काय मने कोरिबो भजन।
साधु सङ्ग कृष्ण सेवा, ना पूजिबो अन्य देवा
एइ भक्ति परम कारण॥"
अर्थ: अन्य सभी भौतिक अभिलाषाओं को त्यागकर, मैं तन-मन से श्रीकृष्ण का भजन करूँगा। साधुओं के संग में रहकर केवल कृष्ण की सेवा करूँगा; क्योंकि यह अनन्य भक्ति ही कृष्ण प्रेम को प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है।
— श्रील नरोत्तम दास ठाकुर (प्रेमभक्ति चन्द्रिका)

हमारी स्वाध्याय यात्रा

भक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि एक विज्ञान है। हमने अब तक यह प्रामाणिक ग्रंथों का अध्ययन पूर्ण किया है:

श्रीमद् भागवतम् (प्रथम स्कन्ध)
श्रीमद् भागवतम् (प्रथम स्कन्ध)
श्रीमद् भागवतम् (द्वितीय स्कन्ध)
श्रीमद् भागवतम् (द्वितीय स्कन्ध)
हरिनाम चिन्तामणि
हरिनाम चिन्तामणि
मनः शिक्षा
मनः शिक्षा
शरणागति
शरणागति
मुकुन्दमाला स्तोत्र
मुकुन्दमाला स्तोत्र
प्रार्थना
प्रार्थना
श्री ब्रह्मसंहिता
श्री ब्रह्मसंहिता
व्रजमण्डल दर्शन
व्रजमण्डल दर्शन
श्री कृष्ण स्वरूप चिन्तन
श्री कृष्ण स्वरूप चिन्तन
वर्तमान पाठ
श्री प्रेम भक्ति चन्द्रिका
श्री प्रेम भक्ति चन्द्रिका

महत्वपूर्ण संसाधन (Resources)

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"जीवन क्षणभंगुर है, पर भगवान का नाम और उनकी कथा शाश्वत है।"

© 2026 नित्यं भागवत-सेवया | श्रील प्रभुपाद की जय

गजेंद्र मोक्ष स्तुति - श्रीमद्भागवतम् (स्कंध 8, अध्याय 3, श्लोक 2-29) - Gajendra Moksha Stuti

गजेंद्र मोक्ष स्तुति

गजेंद्र मोक्ष स्तुति

श्रीमद्भागवतम् (8.3.2 - 8.3.29)

श्लोक मूल संस्कृत (Sanskrit Verse) सार (Essence) भगवान के संबोधन (Names)
8.3.2 ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥
समस्त जड़ तथा चेतना के स्रोत भगवते, पुरुषाया, आदिबीजाय, परेशाय
8.3.3 यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥
उन्हीं का विस्तार, वही आधार स्वयम्भुवम्, परस्मात्-परम्
8.3.4 यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्वचिद्विभातं क्वच तत्तिरोहितम् ।
अविद्धद‍ृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोऽवतु मां परात्पर: ॥
उन्ही से सृष्टि उन्ही में विलय साक्षी, अज, आत्ममूलो, परात्पर:
8.3.5 कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदासीद्गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥
समय के साथ सब विनाश, पर भगवान अपनी महिमा में स्थित रहते है विभुः
8.3.6 न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु
र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥
सामान्य बुद्धि से नहीं समझा जा सकता दुरत्ययानुक्रमणः
8.3.7 दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं
विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥
उनके मंगलमय चरण सबकी काम्य भूतात्मभूताः , सुहृदःिः
8.3.8 न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा
न नामरूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः
स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥
भौतिक जन्म-कर्म, नाम, रूप, लीलाओं से परे
8.3.9 तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥
असंख्य रूप, निराकार भी परेशाय, ब्रह्मणे, अनन्तशक्तये, अरूपाय, उरुरूपाय, आश्चर्यकर्मणे
8.3.10 नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥
कृष्ण कृपा से ही कृष्ण का दर्शन सम्भव आत्मप्रदीपाय, साक्षिणे, परमात्मने, गिरां मनसश्चेतसामप विदूराय
8.3.11 सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥
विशुद्ध सत्त्व में स्थित भक्त दर्शन कर पाते है कैवल्यनाथाय, निर्वाणसुखसंविदे
8.3.12 नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥
असंख्य अवतार शान्ताय,घोराय, मूढाय, गुणधर्मिणे, निर्विशेषाय, साम्याय, ज्ञानघनाय
8.3.13 क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥
सबको जानते हैं क्षेत्रज्ञाय, सर्वाध्यक्षाय, साक्षिणे, पुरुषाय, आत्ममूलाय, मूलप्रकृतये
8.3.14 सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छायोक्ताय सदभासाय ते नमः ॥
यह जगत आध्यात्मिक जगत का प्रतिविम्ब मात्र सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे, सर्वप्रत्ययहेतवे
8.3.15 नमो नमस्तेऽखिलकारणाय
निष्कारणायद्भुतकारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥
वह सबका कारन, उनका कोई कारन नहीं अखिलकारणाय, निष्कारणाय, अद्भुतकारणाय, सर्वागमान्माय, महार्णवाय, अपवर्गाय,
8.3.16 गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥
वैदिक रीती-निति से परे स्वयंप्रकाशाय
8.3.17 मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहतै नमस्ते ॥
भगवान मुक्त, परम करुणामय, निरलस प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय, मुक्ताय, भूरिकरुणाय, भगवते बृहतै
8.3.18 आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभि: स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ ॥
बद्धजीव के लिए दुष्प्राप्य, मुक्तात्मा के लिए सहजलाभ्य ज्ञानात्मने, भगवते, ईश्वराय
8.3.19 यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥
सर्वोच्च आशीर्वाद के प्रदाता अदभ्रदयो
8.3.20 एकातिनो यस्य न कञ्चनार्थं
वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं
गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥
अनन्य भक्तों के आनंद का स्रोत अत्यद्भुतं, सुमङ्गलं
8.3.21 तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम
अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम
अनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥
भौतिक इन्द्रियों से बोधगम्य नहीं अक्षरं, अतीन्द्रियं, परिपूर्णम्
8.3.22 यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥
सभी कृष्ण के क्षुद्रतिक्षुद्र अंश
8.3.23 यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिषः ।
तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥
निरंतर एवं असंख्य सृष्टि तथा विलय
8.3.24 स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्
न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन् न चासन्
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥
परम दिव्य भगवान - भौतिक जगत के कुछ भी उनका वर्णन नहीं कर सकते निषेधशेषो (The Ultimate Balance)
8.3.25 जीजीविषे नाहमिहामुया किम
अन्तर्बहिश्चावृतयेभदेहेन ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणप्रमोक्षम् ॥
शुद्ध भक्त कुछ भी नहीं चाहते
8.3.26 सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥
सबका दिव्य आश्रय विश्ववेदसम्, विश्वात्मानम्, अजम, ब्रह्म, परं पदम्
8.3.27 योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्मि अहम् ॥
कृष्ण प्राप्ति का एकमात्र सूत्र - तीव्र इच्छा योगेशं
8.3.28 नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदमिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥
कृष्ण कृपा से ही माया से मुक्ति संभव प्रपन्नपालाय, दुरन्तशक्तये
8.3.29 नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम् ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥
मेरी त्रुटियों को क्षमा करें, मुझे शरण दें भगवन्तम्

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