गजेंद्र मोक्ष स्तुति
श्रीमद्भागवतम् (8.3.2 - 8.3.29)
| श्लोक | मूल संस्कृत (Sanskrit Verse) | सार (Essence) | भगवान के संबोधन (Names) |
|---|---|---|---|
| 8.3.2 | ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ |
समस्त जड़ तथा चेतना के स्रोत | भगवते, पुरुषाया, आदिबीजाय, परेशाय |
| 8.3.3 | यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ |
उन्हीं का विस्तार, वही आधार | स्वयम्भुवम्, परस्मात्-परम् |
| 8.3.4 | यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्वच तत्तिरोहितम् । अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्पर: ॥ |
उन्ही से सृष्टि उन्ही में विलय | साक्षी, अज, आत्ममूलो, परात्पर: |
| 8.3.5 | कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु । तमस्तदासीद्गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥ |
समय के साथ सब विनाश, पर भगवान अपनी महिमा में स्थित रहते है | विभुः |
| 8.3.6 | न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ |
सामान्य बुद्धि से नहीं समझा जा सकता | दुरत्ययानुक्रमणः |
| 8.3.7 | दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः । चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥ |
उनके मंगलमय चरण सबकी काम्य | भूतात्मभूताः , सुहृदःिः |
| 8.3.8 | न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा । तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ |
भौतिक जन्म-कर्म, नाम, रूप, लीलाओं से परे | |
| 8.3.9 | तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥ |
असंख्य रूप, निराकार भी | परेशाय, ब्रह्मणे, अनन्तशक्तये, अरूपाय, उरुरूपाय, आश्चर्यकर्मणे |
| 8.3.10 | नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ |
कृष्ण कृपा से ही कृष्ण का दर्शन सम्भव | आत्मप्रदीपाय, साक्षिणे, परमात्मने, गिरां मनसश्चेतसामप विदूराय |
| 8.3.11 | सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ |
विशुद्ध सत्त्व में स्थित भक्त दर्शन कर पाते है | कैवल्यनाथाय, निर्वाणसुखसंविदे |
| 8.3.12 | नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे । निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ |
असंख्य अवतार | शान्ताय,घोराय, मूढाय, गुणधर्मिणे, निर्विशेषाय, साम्याय, ज्ञानघनाय |
| 8.3.13 | क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे । पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ |
सबको जानते हैं | क्षेत्रज्ञाय, सर्वाध्यक्षाय, साक्षिणे, पुरुषाय, आत्ममूलाय, मूलप्रकृतये |
| 8.3.14 | सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे । असताच्छायोक्ताय सदभासाय ते नमः ॥ |
यह जगत आध्यात्मिक जगत का प्रतिविम्ब मात्र | सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे, सर्वप्रत्ययहेतवे |
| 8.3.15 | नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायद्भुतकारणाय । सर्वागमान्मायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ |
वह सबका कारन, उनका कोई कारन नहीं | अखिलकारणाय, निष्कारणाय, अद्भुतकारणाय, सर्वागमान्माय, महार्णवाय, अपवर्गाय, |
| 8.3.16 | गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय । नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ |
वैदिक रीती-निति से परे | स्वयंप्रकाशाय |
| 8.3.17 | मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय । स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत प्रत्यग्दृशे भगवते बृहतै नमस्ते ॥ |
भगवान मुक्त, परम करुणामय, निरलस | प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय, मुक्ताय, भूरिकरुणाय, भगवते बृहतै |
| 8.3.18 | आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय । मुक्तात्मभि: स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ ॥ |
बद्धजीव के लिए दुष्प्राप्य, मुक्तात्मा के लिए सहजलाभ्य | ज्ञानात्मने, भगवते, ईश्वराय |
| 8.3.19 | यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति । किं चाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ |
सर्वोच्च आशीर्वाद के प्रदाता | अदभ्रदयो |
| 8.3.20 | एकातिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः । अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥ |
अनन्य भक्तों के आनंद का स्रोत | अत्यद्भुतं, सुमङ्गलं |
| 8.3.21 | तमक्षरं ब्रह्म परं परेशम अव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् । अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूरम अनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥ |
भौतिक इन्द्रियों से बोधगम्य नहीं | अक्षरं, अतीन्द्रियं, परिपूर्णम् |
| 8.3.22 | यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः । नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ |
सभी कृष्ण के क्षुद्रतिक्षुद्र अंश | |
| 8.3.23 | यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिषः । तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥ |
निरंतर एवं असंख्य सृष्टि तथा विलय | |
| 8.3.24 | स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ् न स्त्री न षण्ढो न पुमान् न जन्तुः । नायं गुणः कर्म न सन् न चासन् निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ |
परम दिव्य भगवान - भौतिक जगत के कुछ भी उनका वर्णन नहीं कर सकते | निषेधशेषो (The Ultimate Balance) |
| 8.3.25 | जीजीविषे नाहमिहामुया किम अन्तर्बहिश्चावृतयेभदेहेन । इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणप्रमोक्षम् ॥ |
शुद्ध भक्त कुछ भी नहीं चाहते | |
| 8.3.26 | सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् । विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ |
सबका दिव्य आश्रय | विश्ववेदसम्, विश्वात्मानम्, अजम, ब्रह्म, परं पदम् |
| 8.3.27 | योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते । योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्मि अहम् ॥ |
कृष्ण प्राप्ति का एकमात्र सूत्र - तीव्र इच्छा | योगेशं |
| 8.3.28 | नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय । प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदमिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ |
कृष्ण कृपा से ही माया से मुक्ति संभव | प्रपन्नपालाय, दुरन्तशक्तये |
| 8.3.29 | नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहंधिया हतम् । तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥ |
मेरी त्रुटियों को क्षमा करें, मुझे शरण दें | भगवन्तम् |